Tuesday, 3 June 2014

टिटहरी एक मनमोजी पक्षी ( Lapwing Bird) - (लुप्तप्राय प्रजाति)

   टिटहरी एक मनमोजी पक्षी  ( Lapwing Bird)  - (लुप्तप्राय प्रजाति)  

 टिटहरी एक ऐसा अनोखा पक्षी है जो उड़ता कम है यह अपना अधिकांश समय तालाब और झीलों के नजदीक गुजारता है । भारत के सभी प्रदेशों में टिटहरी पाई जाती है । इसका अंग्रजी नाम ‘‘ लेपविंग ’’ है । भारत में इसकी 2-3 प्रजातियां ही पाई जाती है । टिटहरी का आकार प्रकार कुछ कुछ बगुले से मिलता जुलता होता है । गर्दन बगुले से छोटी होती है । सिर और गर्दन के ऊपर की तरफ और गले के नीचे का रंग काला होता है इसके पंखों का रंग चमकीला कत्थई तथा सिर गर्दन के दोनों ओर एक सफेद चैड़ी पटटी होती है । टिटहरी की दोनों आंखों के सामने एक गूदेदार रचना पाई जाती है इस रचना को देखकर यह पक्षी दूर से ही पहचान लिया जाता है । टिटहरी की दूसरी प्रजाति में आंखों के पास पाई जाने वाल यह रचना पीले रंग की गूदेदार होती है । 
टिटहरी एक मनमोजी पक्षी है । जिसे खुला स्थान जहां कीड़े मकोड़े खाने को मिले रहता है । टिटहरी एक चैकन्ना और चालाक पक्षी है । जो अपने नजदीक आने वाले जानवर (कुत्ते एवं बिल्ली इत्यादि), मनुष्य को देखकर शोर मचाना शुरू कर देता है । टिटहरी दिन रात जाग कर अपने अंडों और बच्चों की देखभाल करता है। । टिटहरी मार्च से अगस्त महीने  के बीच 2-3 या 4 अंडे देती है । टिटहरी के अंडों का रंग मिटटी से मिटटी के रंग से मिलता जुलता होता है ।  इसलिए लोगों की नजर  इनके अंडों पर नहीं पड़ती है । टिटहरी के बच्चों का रंग भी धरती के रंग जैसा ही होता है । मादा टिटहरी और नर टिटहरी दोनों मिलकर बच्चों का पालन पोषण करती है । हमारे देश में सलेटी टिटहरी ( सोशिएब लैप विंग) की प्रजाति पर लुप्त होने का खतरा आ गया है । इंटरनेशनल यूनियन फोर कनजरवेशन आफ नेचर एवं नेचुरल रिर्सोसेस (आई यू सी एन ) ने 2006 को जारी नई रेड डेटा बुक में लुप्तप्राय प्रजातियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि  सलेटी टिटहरी को लुप्त प्रायः श्रेणी में रखा है । भारत के सूखी घास एवं सूखे मैदानी इलाकों में लंबी टांगों वाला यह पक्षी अपना भोजन तलाश करते हुए गुजारा करता है । टिटहरी पक्षी की लम्बाई 11-13 इंच एवं पंखों का फैलाव 26-34 इंच होता है इसका शरीरिक भार लगभग 128-330 ग्राम पाया गया है । इसके पंख गोलाकार होते हैं तथा सिर पर एक उभरा भाग होता है जिसे क्रेस्ट कहते हैं ।  इसकी पूंछ छोटी एवं काली होती है जिसकी लम्बाई लगभग 104-128 मि.मी. पाई गई है इनके चोंच की लम्बाई लगभग 31-36 मि.मी. देखी गई है । अंडों का आकार ओवल होता है जिसकी आकार 33 गुना 47 मि.मी. होती है । ये चिकने एवं पत्थर / मिटटी के रंग के होते हैं एवं इन पर काले धब्बें होते हैं । मादा टिटहरी 4 अण्डें देती है एवं इनसे 28 से 30 दिनों में बच्चे निकल आते हैं । दोनो मादा एवं नर अण्डों की देखभाल एवं सेने का काम करते हैं । टिटहरी चिड़िया टांग आकाश की तरफ उठा कर सोती है और सोचती है कि आकाश उसी के कारण टिका है । आसमान के बारे में अनेक कहावतें हैं उनमें से एक यह कि टिटहरी को हमेशा लगता है कि उसकी टांग हटी कि आसमान गिरा । कोई वैज्ञानित प्रमाण नहीं पर बुजुर्गों के अनुसार उनका कई वर्षो का अनुभव कहता है कि  जिस वर्ष टिटहरी जितने मात्रा में अंडे देती है  उतने माह तक भरपूर बारिश होती है । कहा जाता है कि टिटहरी नदी, नालों व तालाब के किनारे पर ही अंडे रखती है । पानी के किनारों से जितना दूर वह अंडे रखे बारिश उतनी अधिक । अगर वह किनारों से 50 मीटर की दूरी पर अंडे रखे है जिससे लगता है कि बारिश तो अधिक होगी ही साथ ही बाढ़ जैसे हालात भी   बनेंगें । खेतों / जोहड़ के आस पास टिटहरी की तलाश की जाती है फिर देखते हैं कि  उसने कितने ऊंचें अंडें दिए है अगर वह पाल से भी ऊपर अंडे देती है तो समझों कि इस बार पानी की कोई कमी नहीं होगी । 
 टिटहरी के अलावा अन्य पशु पक्षियों को मौसम और अन्य खागोलिक घटनाओं का पूर्वानुमान होता है ।  आज हम प्रकृति से दूर होते जा रहें हैं । पता नही ंहम कब कुछ ऐसा सीखेंगें जो हमें और प्रकृति को एकमेव कर देगा ।








कामुदिनी - भाग्यशाली सुन्दर फूल

कामुदिनी - भाग्यशाली सुन्दर फूल 

कामुदिनी को घाटी की लिली एक मीठी सुगंधित वुडलैंड फूल पौधा है जो कि समशीतोष्ण देशों एशिया, यूरोप और सयुक्त राज्य अमेरिका में पाया जाता है । घाटी की लिली भी लिली के रूप मंे जाना जाता है । घाटी के लिली कामुदिनी जीनस की एकमात्र प्रजाति है । हवा में फहराता घाटी फूल की लिली इसलिए भी रूप में जाना जाता घाटी घास के मैदानों के लिली की तरह, बर्फ की तरह लग रहा है ‘‘ चांदी सफेद स्वर्ग’’ । फे्रंच लोगों का मानना है कि कामुदिनी उगाने वाले भाग्यशाली बना देता है । कामुदिनी दुल्हन का उपहार हो सकता है । एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में मूल प्रजाति के कामुदिनी के जंगली वन हैं । गहरी घाटियां और जंगल किनारे घास । इसके फूल उच्च खुशबूदार तेल निकाल सकते हैं । एक छोटी सी घंटी के आकार के फूल होते हैं । सफेद फूल फांसी की घंटी की स्टिंªग, तो फूल की एक स्अेम लालित्य, ठीक सुरूचिपूर्ण अनुपम चमचमाती , आमतौर पर 6 से 10 हैं । फ्रांस में शादी के समय कामुदिनी का उपयोग किया जाता है, दुल्हन के लिए कामुदिनी के फूल भंेट किए जाते हैं । रोमांटिक जोड़े एक दूसरे को कामुदिनी आर्किड देते हैं । नये वर्ष के सुखद होने की कामना करते हैं ।









Monday, 2 June 2014

कनेर का फूल - (पौधा, पत्तियां ,छाल, बीज और जड़ विषैली )


कनेर का फूल - (पौधा, पत्तियां ,छाल, बीज और जड़ विषैली )

कनेर का फूल मशहूर फूलों मंे से एक है जो गर्मियों के मौसम में ही खिलते हैं । कनेर की चार प्रजातियां सफेद, लाल, गुलाबी और पीली हैं । सफेद कनेर औषधि के उपयोग में बहुत आता है । कनेर के पेड़ को कुरेदने या तोड़ने से दूध निकलता है । कनेर के पेड़ के बारे में कहा जाता है कि सांप इसके पेड़ के आस पास भी नहीं आता है । कनेर को जानवर नहीं खाते हैं इसलिये सड़क मार्ग पर शोभा हेतु बहुतायत से लगाया जाता है । सफेद और लाल फूल वाली देशी कनेर को औषधि (विष से दवा ) के रूप में अधिक उपयोगी होती है । सफेद कनेर के फूल और जड़ को पीस कर पिलाने से सर्पदंश में लाभ होता है । गणपति की आराधना के लिए लाल कनेर अर्पित किये जाते हैं साथ में दूब भी । लाल कनेर में बुद्धि-बल को विकसित करने के तत्व हैं । लाल कनेर की छाल से त्वचा रोग की औषधियां बनायी जाती हैं । 
पीली कनेर - इसमेें पीले फूल लगते हैं तथा पत्तियों लम्बी व पतली होती हैं । पीली कनेर का दूध विषैला होता है और अधिकतर औषधि बनाने के लिए उपयोग किया  जाता है । कनेर के बीज में जहर डाइगाक्सीन होता है जो दिल की धड़कन को कम करता है । भगवान शिव जी की कनेर के फूलों से पूजा करने से भक्त को सुन्दर वस्त्रों की इच्छा को पूरा करती है ।
कनेर (थिविलिया प्रवेनिया) सफेद कनेर के फूल का  प्रयोग फेशियल एवं उबटन के रूप किया जाता है । कनेर के फूल को बेहद पवित्र माना जाता है । इसलिए यह आज भी विभिन्न धार्मिक स्ािलों में बहुतायत में पाया जाता है । वैसे तो कनेर का संपूर्ण पौधा विष युक्त होता है । इसके फल, मूल एवं बीज में  ग्लाइकोसाइडो, नेरिओडोरिन एवं कैरोबिन , स्कापोलिन पाया जाता है । कनेर के पीले फूलों में पेरूबोसाइड भी होता है । 
डाॅ. माइकल एडलेस्टन (श्री लंका)  का कहना है कि कनेर का एक बीज जान लेने के लिए काफी है । कनेर का  जहर डाइगाक्सीन ड्रग की तरह है । डाइगाक्सीन दिल की धड़कन की रतार कम करता है । कनेर का एक बीज डाइगाक्सीन के सौ टेबलेट के बराबर होता है । पहले तो यह दिल की धड़कन को धीमा करता है और आखिरकार एकदम रोक देता है । डाइगाक्सीन के जहर के खिलाफ एंटीडाइगाक्सीन का उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि यह महंगा है इस पर करीब तीन हजार डालर का खर्च आता है ।
.सफेद एवं लाल कनेर की पत्तियों का काढ़ा बनाकर घाव धोने से यह जल्दी भर जाता है । इसके पत्ते को पीस कर तेल में मिलाकर लेप करने से जोड़ों का दर्द दूर होता है । कनेर के पत्तों से सिद्ध तेल खुजली के लिए बनाया जाता है जो बहुत फायदेमंद होता है । श्रावण सोमवार में शिव जी को प्रसन्न करने के लिए मेष व वृश्चिक राशि वाले 109 बार करने के गुलाबी या लाल फूलों को चढ़ाते हुए मंत्र का जाप करें । 









   

नारियल पानी - स्वास्थ्यवर्धक, प्राकृतिक पेय

नारियल पानी - स्वास्थ्यवर्धक, प्राकृतिक पेय 

नारियल पानी अपने पौष्टिक और स्वास्थ्य गुणों के लिए प्रकृति का सबसे ताजा पेय  है । यह मीठा, तरल जिसमें शकरा, विटामिन, खनिज, इलेक्टोलाइटस, एंजाइम,अमोनो एसिड, साइटोकाइन और पादप हार्मोन रसायनों से भरपूर होता है ।  नारियल की तासीर ठंडी होती है । नारियल पानी हल्का, प्यास बुझाने वाला, अग्निप्रदीपक, वीर्यवर्धक तथा मूत्र संस्थान के लिए बहुत उपयोगी होता है ।  गर्मी में लगने वाले दस्तों में एक कप नारियल पानी में पिसा जीरा मिलाका पिलाने से दस्तों में तुरंत आराम मिलता है । ठंडा हरा नारियल पानी प्यास बुझाने में सहायक होता है । नारियल पानी त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है । इसे नियमित रूप से त्वचा पर लगाने से दाग-धब्बे तो दूर होते हैं साथ ही त्वचा जवां नजर आने लगती है । यह बहुत अच्छा क्लींजर होता है । जिसका प्रयोग त्वचा के डेटोक्सीफाइंग के रूप में किया जाता है । नारियल पानी में प्राकृतिक बायोएक्टिव एंजाइमंस जैसे एसिड फाॅस्फेट, केटेलेस, डिहाइडोजनेज, डायस्टेज, परआक्सीडेस, आरएन ए पीसी आर होते हैं जो कि पाचन औ चयापचय में मदद करते हैं । 
नारियल पानी - 100 ग्राम प्रति पोषण मान - ऊर्जा - 19 किलो कैलोरी, कार्बोहाइडेट - 3.71 ग्राम, प्रोटीन - 0.72 ग्राम, वसा - 0.20 ग्राम, फाइबर-1.1 ग्राम, फोलेट - 3 माइक्रोग्राम, नियासिन-0.082 मिलीग्राम, पायरीडोक्सीन -0.032 मिलीग्राम, राइबोलेविन-0.057 मिलीग्राम, थायमिन-0.030 मिलीग्राम, विटामिन सी -2.4 मिलीग्राम, सोडियम-105 मिलीग्राम, पोटेशियम 250 मिलीग्राम, कैल्शियम -24 मिलीग्राम, तांबा-40 मिलीग्राम, लोहा- 0.29 मिलीग्राम, मैगनीशिय- 25 मिलीग्राम, मैंगनीज- 0.142 मिलीग्राम, जस्ता- 0.10 मिलीग्राम ।
गर्मियों में नारियल पानी के सेवन से, आपको दिव्य आनंद प्राप्त होगा । यह केवल आपको ताजगी ही नहीं, बल्कि इस में कई सारे स्वास्थ्यवर्धक गुण भी छुपे हैं । नारियल पानी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिये बहुत ही अच्छा माना गया है । यदि पेशाब में जलन हो रही हो, डीहाड्रेशन हो गया हो, त्वचा में निखार चाहिये हो या फिर मोटापा घटाना हो तो नारियल पानी पीजिये । नारियल का पानी हमारे ब्लड प्रेशर को ठीक रखता है । नारियल का पानी शरीर को ठंडा करता है और शरीर का तापमान ठीक बनाये रखता है । नारियल का पानी शरीर के मेटाबोलिस्म रेट को बढ़ाता है जो की वनज को कम करने में सहायक होता है । नारियल पानी इमयुन सिस्टम को ताकत देता है जिससे की शरीर की बीमारियों से लड़ने में सहायता मिलती है । नारियल पानी की दो दो बूंद सुबह-शाम कुछ दिनों तक नाक में टपकने से आधा सीसी के दर्द में बहुत आराम मिलता है । महिलाओं को गर्भकाल के दौरान नारियल पानी रोजाना पिलाना चाहिए । डाबर ने पैकेज्ड नेचुरल कोकोनट वाटर लांच किया है कंपनी इसे पानी के बाद दूसरा शुद्ध पेय बताती है । नारियल पानी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और एनर्जी डिंªक के रूप में काम करता है । नारियल पानी को पोटेशियम की उच्च मात्रा गुर्दे की पथरी को दूर करने में सहायक है । शुद्ध नारियल पानी एक आदर्श पेय है । नारियल पानी दूध से भी अधिक पौष्टिक है , कम वसा और कोलेस्ट्राल नहीं । नारियल पानी पौष्टिक एवं स्वास्थ गुणों के साथ ताजा स्वाद के लिए पूरी दुनिया में बहुत ही लोकप्रिय है । व.जन घटाने के लिए के नारियल पानी पियें क्योंकि इसमें वसा नहीं होती है । गर्भावस्था के दौरान नारियल पानी पीने से इसमें लायोरिक एसिउ प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है । नारियल पानी गुर्दे की बीमारी मंे बहुत फायदेमंद होता है यह मूत्रवर्धक होने से गुर्दे की पथरी को पिघलाने  और समाप्त करने में मदद करता है । त्वचा चिकित्सा के लिए नारियल पानी अदभुत प्रभाव रखता है जैसे मुँहासें, धब्बे, झुर्रिया, खिचाव के निशान, सेल्युलाईट और एक्जिमा आदि तथा त्वचा को चिकना एवं चमकदार बनाता है और यह एक सर्वश्रेष्ठ माॅइस्चराइजर की तरह काम करता है । नारियल पानी  एक महान प्राकृतिक कंडीशनर है । नारियल पानी के स्वास्थ्य लाल अनगिनत हैं पहला यह कि नारियल पानी एंटी ऑक्सीडेंट  और पोटेशियम खनिज से भरपूर है । दूसरा शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स की आपूर्ति करता है । नारियल पानी को ‘‘ प्रकृति माँ का खेल प्रेय ’’ माना जाता है ।






Sunday, 1 June 2014

पामेरियन - एक नन्हा खूबसूरत डाॅग

पामेरियन - एक नन्हा खूबसूरत डाॅग  
पामेरियन  एक छोटी नस्ल जिसका नाम पामेरियेना स्थान के नाम पर पड़ा जो कि जर्मनी और पौलेंड क्षेत्र में है तथा यह नस्ल स्पिट्रज नस्लों से विकसित हुई है । मूल पामेरियन नस्ल का शरीरिक भार लगभग 13.5 किलो जो कि भेड़ चरवाहों के साथ उनका सहयोग करते थे । सन् 1888 में अमेकिन केनल क्लब ने इस मान्यता दी तथा इंग्लैंड में यह एक बहुत लोकप्रिय नस्ल जिसे प्रजनन विधि से आकार और भार में छोटा किया गया । पामेरियन की प्रतिभा की वजह से इसका उपयोग प्रहरी, चपलता, और प्रदर्शन हेतु सर्कस में कलाकारों के साथ उपयोग हुआ ।
विवरण - पामेरियन खिलौना समूह के छोटे आकार के कुत्तों में वर्गित है । जिनका  सिर बेज आकार जो कि शरीर के अनुपात में होता है । इनकी नाक सीधी, छोटा मजल होता है इनका रंग शरीर की त्वचा के हिसाब से बदलता रहता है । इन मध्यम आकार की गहरी बादाम आकार की आंखें  होती हैं । छोटे खड़े कान जो ऊपर की ओर उठे होते हैं । पूंछ के बाल खड़े खड़े होते हैं । पामेरियन के शरीर पर एक मोटी और दोहरी बालों की तह होती है । अन्दर की बालों की तह नरम मोटी और छोटे बालों की  और बाहर के बालों की तह लंबी, सीधी और मोटे बालों की होती है । इनकी गर्दन एवं छाती पर लम्बें बालों का घेरा होता है । पामेरियन विभिन्न रंगों में पाये जाते हैं जिसमें लाल, नारंगी, सफेद, क्रीम,नीले, भूरे, काले, काले और भूरे, चितकबरे, सफेद रंग पर धब्बों या लाइने भी पाई जाती हैं । पामेरियन एक बुद्धिमान, वफादार और सीखने की जिज्ञासा रखने के गुणवाला कुत्ता है । यह एक अच्छा साथी और शो डाग होता है । यह एक विन्रम स्वभाव की नस्ल है जो सबका स्नेह ले लेती है । पामेरियन को अच्छी बातें सिखाई जा सकती हैं । इसका छोटा आकार घर के बुजुर्ग सदस्यों का अच्छा साथी बनता है । पामेरियन की लम्बाई लगभग 7-12 इंच तथा शरीरिक वजन 1-3 किलो होता है । इन्हें घरों में आसानी से पाला जा सकता है इनके शरीर में बाल होने की वजह से इन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाना होता है ।
स्वास्थ्य समस्याएं - 1. एलर्जी - पामेरियन को किसी भी चीज से भी एलर्जी हो सकती है । एलर्जी होने पर वह पंजे चाटता है एवं चेहरे पर खुजली करता है साथ ही कुछ पामेरियन को मिर्गी भी हो सकती है तुरंत पशुचिकित्सक से परामर्श करंे । 2. नेत्र समस्याएं - मोतियाबिंद, सूखी आंखें, आंखों से अधिक आंसू बहना, अंधापन एवं आंखों में लालिमा होना 3. हिप डिसप्लेसिया /पटेला के खिसकने का रोग हो सकता है । 4. दांत और मसूड़ों की समस्याएं - नियमित रूप से दांतों का परीक्षण डाक्टर से कराते रहें । पामेरियन को स्वस्थ्य रखने के लिए रोज टहलने के लिए ले जाना जरूरी है । खुले मैदान में खेलना इनके स्वस्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है । इनके लम्बें बालों में कई बार ब्रश करना जरूरी होता है । इनकी अन्दर की त्वचा के बाल साल में दो बार गिरते हैं । प्रतिदिन इनकी आंखों और कानों की सफाई जरूर करें । नियमित इनके दांतों की जांच करवायें ।
प्रजनन -  पामेरियन में नर में परिपक्वता की उम्र 12-18 महीने तथा मादा में 18-24 महीने होती है । मादा 3 से 14 दिन तक ऋतुकाल में रहती है । मादा में गर्भकाल 63 दिन ( 60-65 दिन )होता है । पामेरियन के पिल्ले जन्म के समय बहुत छोटे होते हैं तथा जन्म के समय वजन 2 से 5 औंस होता है । 
आहार - पामेरियन को संतुलित आहार देना इनकी देखभाल का एक महत्वपूर्ण भाग है । आहार उसके आकार, उम्र, बिल्ड, चयापचय और गतिविधि के स्तर पर निर्भर करता है । उच्च गुणवत्ता वाला भोजन जो संतुलित हो दिया जाए । घर पर बना खाना जिसमें पोषक तत्वों का संतुलित समावेश हो फायदेमंद रहेगा इसके लिए पशुचिकित्सक /वैज्ञानिक से सलाह उचित रहेगी । पामेरियन स्टार्चयुक्त भोजन पसंद करते है। जैसे ब्राउन राईस, साबुत चावल, दलिया, चावल से बने व्यंजन/उत्पाद, आटे की रोटी, नूडल्स इत्यादि वे बड़े चाव से खाते हैं । मूलतः पामेरियन मांसाहारी होते है तथा उनकी जरूरत से ज्यादा खाने की उनकी प्रवृति उन्हें मोटा बना सकती है इससे बचने के लिए इनके भोजन पर निगरानी जरूर रखें । पामेरियन को कभी चाकलेट न दें इसे उन्हें पचाना कठिन होता है और वे बीमार हो सकते हैं । कभी भी अचानक उनके आहार में परिवर्तन न करें, आहार बदलने के पहले पशुचिकित्सक से सलाह जरूर लें जीवनकाल - पामेरियन का जीवनकाल लगभग 15 वर्ष का होता है ।







ट्यूलिप फूल - रोमांस और रचनात्मकता का प्रतीक

ट्यूलिप फूल - रोमांस और रचनात्मकता का प्रतीक

ट्यूलिप फूल वसंत ऋतु में फूलने वाला फूल है जो एशिया, अफगानिस्तान, काश्मीर से कुमाऊँ तक के हिमालयी क्षेत्र, ईरान, टर्की, चीन, जापान, साइबीरिया में उगाया जाता है । फूलों में गंध का अभाव रहता है पर मनमोहक विशुद्ध और मिश्रित लाल, सुनहरे और बैंगनी रंगों के फूल सभी को मोह लेते हैं । काश्मीर अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है और ट्यूलिप फूल इसकी सौंदर्य को कई गुणा बढ़ा देता है । ट्यूलिप फूल सफेद, पीले, नीले, लाल, गुलाबी, आॅरेंज रंग आपको मोहित कर देगें । ट्यूलिप के फूलों के बिना नीदरलैंड्स की कल्पना ही नहीं की जा सकती है ।
दुनिया में कड़कड़ाती ठंड के बाद जब बसंत ऋतु आती है तो फूलों की रौनक नजर आने लगती है  । लगभग 80 प्रतिशत ट्यूलिप के फूलों का उत्पादन नीदरलैंड में होता है । स्विजरलैंड में भी फूलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है ।
ट्यूलिप फूल कई रंगों और आकार के ये बड़े सुकोमल फूल होते हैं । रंगों की तरह इनके संदेश भी अलग अलग माने गये हैं । ट्यूलिप के फूल भेंट करते समय इनके रंग और अपने पैगाम को ठीक से देख लें । 1. लाल रंग के ट्यूलिप का पैगाम है - ‘‘ मेरा विश्वास कीजिए ’’ । 2. बहुरंगे ट्यूलिप फूलों का अर्थ है - ‘‘ आपकी आंखें बहुत सुन्दर है ’’ । 3. सामान्य रंग का ट्यूलिप फूल कहता है - ‘‘ हृदय का सम्पूर्ण प्रेम अर्पित ’’ ।
ट्यूलिप दुनिया में सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाला फूल है । कप के आकार के पंखुड़ियों से घिरे हुए ये लाल, बैंगनी, गुलाबी, सफेद, नारंगी और कई रंगों और किस्मों में उपलब्ध है । ट्यूलिप फूल हाॅलैंड का सरकारी आॅफिसियल फूल रहा है । इसे उगाना आसान है अतः ये उद्यान के लिए आदर्श होते हैं । ट्यूलिप फूल आम तौर पर उनके भरपूर रंग की वजह से रोमांस और रचनात्मकता का प्रतीक माना जाता है । नीदरलैंड, ट्यूलिप फूलों की धरती के रूप में जाना जाता है ।













ब्लड प्रेशर (.बी.पी.) - तनाव एवं चिंता का रोग

ब्लड प्रेशर (.बी.पी.) - तनाव एवं चिंता का रोग

भारत में हर तीन में से एक वयस्क में हाई बीपी की समस्या है और इसमें से अधिकतर को इसका पता नहीं । अनियमित दिनचर्या और जीवन शैली, भागमभाग की वजह से होने वाले तनाव ही इसका मुख्य कारण हैं । आज बीपी के लिए उम्र का कोई पैमाना नहीं रह गया है । हर उम्र के व्यक्ति को इसकी समस्या हो सकती है । कई लोगों को कई सालों तक इसका कुछ पता ही नहीं चलता जब कारण कई अंगों पर दुष्प्रभाव सामने आने लगते हैं तब इसका पता चलता है । साइलेंट किलर है बीपी, हृदय रोगों के पीछे यह सबसे बड़ा कारण है । 
क्या है बी पी - हमारे दिल से पूरे शरीर को खून की सप्लाई धमनियों के जरिये बराबर होती रहती है ब्लड को पूरे शरीर में पहुंचाने के लिए हमारा दिल बराबर सिकुड़ता तथा फैलता रहता है जो एक मिनट में 60 से 70 बार होता है जब दिल सकुड़ता है तब खून अधिक दाब के साथ धमनियों में जाता है दिल सिकुड़ने के बाद वापस नार्मल स्थिति में तो आता है परन्तु खून का दबाव न्यूनतम रहती है इन दोनों यानि अधिकतम और न्यूनतम दोनों मापों को बीपी कहते हैं । किसी भी व्यक्ति का बीपी सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप के रूप में जाना जाता है । जैसे 120/80 सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या धमनियों में दाब को दर्शाता है । डास्टोलिक बीपी अर्थात नीचे वाली संख्या एक स्वस्थ्य व्यक्ति का सिस्टोलिक बीपी 90 और 120 मिलीमीटर के बीच होता है सामान्य डायस्टोलिक बीपी 60 से 80 मिलीमीटर  के बीच होता है । बीपी संबंधी दो प्रकार की समस्याएं देखने में आती हैं एक हाई बीपी और दूसरा लो बीपी । बीपी का कम या अधिक होना दोनों की स्थितियां हमारे स्वास्थय के लिए हानिकारक है ।
क्या है हाई बीपी - जब व्यक्ति का बीपी 120/80 से ऊपर हो तो उसे हाई बीपी या हाइपरटेंशन कहते हैं ।  140/90 या उससे अधिक का बीपी उच्च समझा जाता है हाई बीपी से हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, धमनियों का सख्त होना, आंखें खराब होने और मस्तिस्क खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है । 
क्यों होता है हाई बीपी - फास्टफुड का सेवन जिससे अधिक कोलेस्ट्राल और वसा की मात्रा रक्त नलिकाओं में अवरोध उत्पन्न करती है । महिलाओं में गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन भी कम उम्र की लड़कियों एवं महिलाओं में जिम्मेदार है । कम उम्र मंे ही बहुत कुछ पा लेने की चाहत,केरियर की चिंता, नौकरी की स्थितियां का मानसिक तनाव उत्पन्न करती है । हाई बीपी धीमे जहर की तरह काम करता है इसके कारण धीरे धीरे शरीर के सभी अंग खराब हो सकते हैं । मस्त्किघात (लकवा) होने का डर हमेशा बना रहता है ।
हाई बीपी के लक्षण - सिर में भारीपन, चक्कर आना और दर्द रहना, शरीर में आलस रहना, नींद न आना, अधिक पेशाब आना, गैस की तकलीफ व एसिडिटी होना, जी घबराना, प्यास का अभाव सा रहना, नाक से रक्त स्त्राव, जरा से चलने /दौड़ भाग करने से सांस का फूलना, दमा जैसी हालात होना, स्मरण शक्ति कमजोर होना, शरीर में कमजोरी महसूस होना, हृदय में दर्द और हाथ पैरों में दर्द होना, कभी कभी कानों में तरह तरह की अनावश्यक सी आवाजें सुनाई देती हैं , शरीर में लकवा सा हो जाना, नेत्रों में खून उतर आना आदि लक्षण हाई बीपी में देखने को मिलते हैं ।  बीपी का कम या अधिक होना दोनों की स्थितियां हमारे स्वास्थय के लिए हानिकारक है । 
हाई बीपी होने पर क्या करें - हाई बीपी वालों को नमक का प्रयोग कम कर देना चाहिए । नमक 10 ग्राम से कम करके 3 ग्राम तक लेना चाहिए, हाई बीपी में रक्त गाढ़ा हो जाने से प्रवाह धीमा हो जाता है जिससे धमनियों और शिराओं में दबाव बढ़ जाता है लहसुन खायें, लहसुन खून को पतला करता है और थक्का नही जमने देता है । सुबह-शाम आंवले और शहद एक चम्मच लें , बढ़े हुए बीपी में आधा गिलास कुनकुन पानी में एक चम्मच काली मिर्च पाउडर घोलकर हर 2-2 घंटे में लें । तरबूज के बीज तथा खसखस के बीज पीस कर बराबर मात्रा में एक चम्मच खाली पेट लें । 5 तुलसी के पत्ते एवं 2 नींम के पत्ते पीस कर 20 मि.ली. पानी में खाली पेट लें । पपीता खाली पेट खायें । पालक एवं गाजर का रस एक गिलास सुबह-शाम लें । करेला तथा सहजन की फली हाई बीपी में हितकारी होते हैं, प्याज, लहसुन एवं अदरख का रस एंटीआक्सीडेंट का काम करता है । तीन ग्राम मैथी दाना सुबह-शाम पानी के साथ, अगर संभव हो तो नंगें पैर हरी घास पर 10-15 मिनट चलें । किसमिस रात भर पानी में भिगोकर सुबह उठकर खाली पेट खायें । छोटी इलायची छिलके सहित पीसकर नित्य सुबह खाली पेट लेना बीपी को कम कर देता है । अण्डे  का सफेद हिस्से में बीपी को घटाने की क्षमता पाई गई है । दही रोज खाने से हाई बीपी का खतरा कम हो जाता है । कुछ फलों एवं सब्जियों में पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है जो हाई बीपी को कम करने में सहायक है - केले, किसमिस, आलू, टमाटर, पालक, रतालू, कीवी, खुबानी, संतरे, बीन्स, खजूर और अंजीर । लहसुन पीसकर दूध में डालकर पीने से बीपी मंे आराम आ जाता है । गेंहू और चने का आटा बराबर बिना चोकर निकाले रोटी खांये, ब्राउन चावल खाने की आदत डालें । नियमित व्यायाम, खूब तेज लगातार 10 मिनट पैदल चलना सर्वोतम व्यायाम है, योग/ध्यान और प्राणायाम रोज करना चाहिए । पंचमुखी रूद्राक्ष की माला / आंक के फूलों की माला भी काफी प्रभावशाली पायी गयी है ।  
क्या है लो बीपी - लो बीपी की स्थिति वह होती है कि जिसमें रक्त वाहिनियों में  खून का दबाव काफी कम हो जाता है सामान्य रूप से 90/60 एमएम एजी को लो बीपी की स्थिति माना जाता है । शरीर में ब्लड का दबाव कम होने से आवश्यक अंगों तक पूरा ब्लड नहीं पहुंच पाता है जिससे उनके कार्यों में बाधा पहुंचाता है । क्यों होता है लो बीपी - डीहाइडेशन, अधिक पसीना आना, बुखार, भोजन में पोषक तत्वों की कमी, कुपोषण, खून की कमी, पेट व आंतों , किडनी और ब्लेडर में खून का कम पहुंचना, निराशा का भाव लगातार बने रहना, ज्यादा गर्म वातावरण में रखना लो बीपी के लक्षण - चक्कर आना, आंखों के सामन अंधेरा छा जाना और बेहोशी आना, हार्ट बीट तेज हो जाना, हाथ, पैर ठंडे पड़ जाना, सुस्ती, नींद, सिरदर्द एवं सीने में दर्द इत्यादि । 
लो बीपी में क्या करें - तुरंत ही बैठ या लेट जांए, अपनी मुटिठयों को खोले बंद करें, लम्बी सांस अंदर बाहर खींचे, चीनी, नीबू, नमक का शर्बत पिएं, पैरों के नीचे दो तकिए लगाकर लेट जाएं । लो बीपी में चुकंदर का जूस काफी कारगर है रोजाना 100-100 मि.ली. सुबह शाम पीना चाहिए । नमक का सेवन कीजिए, मल्टी विटामिन स्पलीमेंट, विटामिन बी काम्पलेक्स, विटामिन सी और प्रोटीन लेना चाहिए । योग में अनुलोम विलोम, भस्तिका, उज्जायी, प्राणायाम, कपालभाति, उत्तानपादासन, कटिचक्रासन, पवनमुक्तासन, नौकासन, मंडूक आसन तथा लेटकर साइकलिंग करें । लो बीपी के व्यक्ति को ज्यादा बोलना नहीं चाहिए तथा चुपचाप बायीं करवट लेट जाना चाहिए अगर नींद आ जाये तो सो जाना चाहिए । 
कैसे लें बीपी - हमारा बीपी दिन भर बदलता रहता है बीपी जांच के लिए चिकित्सक के पास पहुंचने के बाद कम से कम 5-10 मिनट के आराम के बाद ही अपना बीपी लें । लंबा चलने के बाद, सींढियां चढ़ने , दौड़ने भागने के तुरंत बाद बीपी बढ़ा हुआ आता है । जांच के आधा घंटे पहले चाय, काफी, कोल्ड ंिडंक और धुम्रमान नहीं करना चाहिए । मरकरी के मापक यंत्र इलेक्टानिक यंत्रों से ज्यादा सही रीडिंग देते हैं ।  चिंतित रोगी का बीपी बढ़ा हुआ आता है । व्यायाम के बाद बीपी बढ़ जाता है । क्या आप जानते हैं दाएं एंव बाएं हाथ का बीपी अलग-अलग होता है । बीपी रोग का उपचार विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह से करें एवं उपचार की दवा नियमित लें तथा नियमित बीपी नापने की आदत डालें ।