Wednesday, 14 May 2014

कड़कनाथ

 मुर्गी  की  यह नस्ल   मध्यप्रदेश के झाबुआ और धार जिले में पाई जाने वाली  प्रसिद्ध प्रजाति  यहाँ के आदिवासियों और जनजातियों में बहुत लोकप्रिय है ।  इस मुर्गी  का काला  रंग, काले पंख और काली टांगों होती  है ।  इसे झाबुआ का "गर्व" और "काला सोना" भी कहा जाता है । जनजातीय लोगों में इस प्रजाति  को ज्यादातर "बलि" के लिये पाला जाता है, दीपावली के बाद, त्योहार आदि पर देवी को बलि चढाने के लिये इसका उपयोग किया जाता है । इसकी खासियत यह है कि इसका खून और माँस काले रंग का होता है । लेकिन यह  मुर्गी    दरअसल अपने स्वाद और औषधीय गुणों के लिये अधिक मशहूर है। शोध के अनुसार इसके मीट में सफ़ेद चिकन के मुकाबले "कोलेस्ट्रॊल" का स्तर कम होता है, "अमीनो एसिड" का स्तर ज्यादा होता है । यह कामोत्तेजक होता है और औषधि के रूप में "नर्वस डिसऑर्डर" को ठीक करने में काम आता है । कड़कनाथ के रक्त में कई बीमारियों को ठीक करने के गुण पाये गये हैं, लेकिन आमतौर पर यह पुरुष हारमोन को बढावा देने वाला और उत्तेजक माना जाता है । इस प्रजाति के घटने का एक कारण यह भी है कि आदिवासी लोग इसे व्यावसायिक तौर पर नहीं पालते, बल्कि अपने स्वतः के उपयोग हेतु  घर के पिछवाडे़ में पाल लेते हैं । कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले माँस वाला चिकन है । झाबुआ में इसका प्रचलित नाम है "कालामासी" । आदिवासियों, भील, भिलालों में इसके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण है इसका स्थानीय परिस्थितियों से घुल-मिल जाना, उसकी "मीट" क्वालिटी और वजन । कड़कनाथ या कालामासी देसी नस्‍ल की मुर्ग़ी है जो छत्‍तीसगढ़ और मध्‍यप्रदेश में पाई जाती  । इसकी कुकड़ कूं की आवाज कड़कदार होती है। इस कारण से ही इसे कड़कनाथ कहते हैं। काले पंखों और इसके मांस के भी काले होने की वजह से इसे कालामासी भी कहते हैं। कड़कनाथ मध्‍यप्रदेश और छत्‍तीसगढ के भील आदिवासियों का पालतू पक्षी रहा है। कड़कनाथ की रोगप्रतिरोधक क्षमता बहुत मजबूत होती है। इसे कोई रोग नहीं होता। बाजार में कड़कनाथ 550 रुपए से 600 रुपए प्रति किलो के दर से बिक रहा है। कई बार इसे विशेष ऑर्डर पर झाबुआ से मंगवाया जाता है।






कड़कनाथ के मांस में प्रोटीन १८-२० प्रतिशत के बीच होती  है। कोलेस्ट्रॉल ०-७३-१ प्रतिशत जबकि सफ़ेद चिकन मेँ यह १३-२५ प्रतिशत तथा लौह तत्व २६ प्रतिशत पाया जाता  है।  कड़कनाथ के  अंडे का उपयोग आदिवासी सिरदर्द , प्रसव के बाद होनेवाले सिरदर्द , अस्थमा , गुर्दे की सूजन आदि के इलाज में उपयोग किए जाता है। कड़कनाथ के रक्त में मेलेनिन पिगमेंट ह्रदय में रक्त प्रवाह बढ़ाने का कार्य करता है ठीक वैसे  ही जैसे की वियाग्रा या सिलडेनाफिल सिइट्रेट वासोडीलेटर का काम करते  हैं यही कारण है  की यह कामोत्तेजक - शरीर की ताकत बढाने वाला माना जाता है। 


   






Monday, 12 May 2014

कबीर जयंती -2014

कबीर जयंती २०१४ 

कबीर जयंती ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को मनाई जाती है। कबीर का नाम कबीरदास, कबीर साहब  एवं संत कबीर जैसे रूपों में भी प्रसिद्ध है । कबीर का जन्म काशी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से होना   माना जाता है। कहा जाता है कि काशी में स्वामी रामानंद ने भूलवश अपने एक ब्राह्मण भक्त की विधवा   कन्या को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया जिसके फलस्वरूप संत कबीर का जन्म हुआ किन्तु लोकलाज के भय से उस ब्राह्मण कन्या ने बालक को लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया, जिसे नीमा और अली या नीरू नाम के निःसंतान जुलाहा अपने घर ले आये और उसका लालन- पालन किया। कबीर का जन्म सन्  1398 ई. के लगभग माना जाता है। कहते हैं कबीर बचपन से ही हिन्दू भाव से भक्ति करने लगे थे। 'राम नाम'  जपते  हुए वे कभीकभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। उन्हें स्वामी रामानंद के शिष्य के साथ ही प्रसिद्ध  सूफी मुसलमान फकीर शेख तकी का भी शिष्य माना जाता है।
संत कबीर ने भेदभाव को भुलाकर हमेशा भाईचारे के साथ रहने की सीख दी है। सामाजिक विषमता को दूर करना ही उनकी पहली प्राथमिकता थी। 
 काशी के पास मगहर  में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद   उत्पन्न हो गया था।  हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का  ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम   रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है।

संत कबीर के प्रसिद्ध दोहे 

१. गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय।   बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।

२. ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए

३. बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर

४. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय । जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।।

५. दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।।

६. माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।।

७. साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये।  मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए ।।

८. कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख ऊपजै, और ठगे दुख होय।।










Sunday, 11 May 2014

नवतपा-2014


नवतपा-2014 

 ज्येष्ठ माह में  सूर्य जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब  नवतपा शुरु होते है।  इस साल नवतपा  25 मई  - 3 जून तक हैं।  नवतपा मैं सूर्य का तापमान  चरम  सीमा  पर होता  हैं  तथा इस  दौरान भीषण गर्मी पड़ती है । नवतपा के समय  अधिक गर्मी बारिश के लिए  अच्छी  मानी जाती है। अधिक गर्मी से जमीन पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जो समुद्र की लहरों को अपनी ओर खींचता है और  समुद्र में उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाता है परिणाम स्वरुप  अच्छी बारिश होती है। सूर्य जिसे हम  देवता मानते हैं हमें जीवन शक्ति देता है।  हमें सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर अपने को  ऊर्जावान बना लेना चाहिए ।




 








बुध्द जयंती २०१४

बुध्द जयंती २०१४

वैशाख   पूर्णिमा के दिन भगवान  बुध्द  को   वर्षो की कठोर साधना  के बाद बोध  गया (बिहार )  में बोधी पेड़ के नीचे  ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे  सिद्धार्थ से बुध्द  बन गए। सिद्धार्थ को बूढ़े आदमी , बीमार रोगी तथा  एक  अर्थी को देख कर विरक्ति की भावना का उद्गम  हुआ। सुन्दर पत्नी यशोधरा ,दुधमुहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोङकर सिद्धार्थ तपस्या के लिये चल पड़े। जिस पीपल पेड़ के  नीचे  सिद्धार्थ को  बोध मिला वह बोधी पेड़ कहलाया और गया के समीपवर्ती का स्थान बोधगया कहलाया। 
उपदेश - भगवान  बुध्द ने लोगों को मद्यमार्ग का उपदेश किया। अहिंसा पर जोर दिया। यज्ञ और पशु बलि की निंदा की।  जीवन की पवित्रा बनाये रखना। तृष्णा  का त्याग। कर्मा को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना। शांति मन के अंदर  से आती  है। जैसा हम सोचते  हैं वैसा  ही बन जाते   हैं. दूसरों के दोषों को मत देखो।  जीने के लिये खाओ ,खाने के लिये मत जियो। 


                                                    

Saturday, 10 May 2014

गुड़हल के औषधीय गुण

गुड़हल के औषधीय  गुण


 गुड़हल एक खूबसूरत फूलों वाला पौधा है इस फूल को कई धार्मिक संस्कारो और चढावे में इस्तेमाल किया   जाता  है जिनका रंग लाल , सफेद , गुलाबी , पीला या बैंगनी होता है ! ब्लूयूटे  गुड़हल, क्यूबा का बेई विनालेस , पिपर सरपरीज , पीला गुड़हल, गुलाबी गुड़हल] नीला गुड़हल, और लाल गुड़हल। गुड़हल के  फूल गणेश जी और माँ देवी के प्रिय मानें जाते हैं। गुड़हल फूल पीसकर लगाने से बालों का रंग सुन्दर हो जाता है। गुड़हल के  फूलों को घी मेँ भूनकर महिलओं  को खिलाने से मासिक स्त्राव आसानी से  बंद हो जाता है।  गुड़हल की पत्तियाँ की चाय वजन घटाती है।    गुड़हल के फूल की कलियाँ खाने से जोडों के विकार दूर होते हैं। 







Saturday, 3 May 2014

Shani Jayanti 2014

Shani Jayanti 2014

Shani Jayanti is the birth anniversary of Lord Shani celebrated on Wednesday , amavasya in the month of May 28, devotee visit shani temples for blessing of Lord Shani. In puja bath the idol with mustard oil, sesame seeds and chant below given shani mantra.” Om Shanishcharya Namah” A Observe fast and chant shani mantra throughout the day. As lord shani is black in complexion, donate sesame, back pepper, peanut oil, pickle, black umbrella, clove, basil leaf and black salt. Worshiping lord Hanuman also pleases Lord Shani