Tuesday, 27 May 2014

वट सावित्री व्रत - अखण्ड सौभाग्य एवं सुखी दांपत्य जीवन हेतु

वट सावित्री व्रत - अखण्ड सौभाग्य एवं सुखी दांपत्य जीवन हेतु 

वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की  प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना जाता है । भारतीय संस्कृति में यह वृत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है । ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक करने में भरोसा रखते हैं ।  वट सावित्री व्रत में ‘‘वट’’ और ‘‘सावित्री’’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है । पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है । पाराशर मुनि के अनुसार - ‘वट मूल तोपवास’ ऐसा कहा गया है । वट में ब्रहमा, विष्ण और महेश तीनों का वास है । इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है । वट वृक्ष  अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है । वृट वृक्ष दीर्घायु व अमरत्व बोध के प्रतीक के नाते भी स्वाीकार किया जाता है । वृट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का प्रतीक है । भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था ।  
ज्येष्ठी अमावस्या के दिन वट सावित्री व्रत वृक्ष के पूजन की परंपरा है । इसे ‘‘ दाही अमावस’’ के नाम से प्रसिद्ध है ।  इस दिन वटवृक्ष को जल से सींचकर उसमें सूत लपेटते हुए उसकी 108 बार परिक्रमा की जाती है । इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है । वटवृक्ष को सनातन धर्म में इसे दैवी शक्ति सपन्न बताया गया है । पुराणों में लिखा है कि वटवृक्ष के मूल में भगवान ब्रहम, मध्य में भगवान विष्णु तथा अग्रभाग में दिवाधिदेव महादेव का वास होता है । वनस्पति विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि पर्यावरण को शुद्ध बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । वट वृक्ष सैकड़ों वर्षा तक हरा-भरा  रहता है । अतः पति की लम्बी आयु की कामना के लिए इसका पूजन सर्वथा उचित है । सही मायने में वट सावित्री व्रत सुखी दांपत्य जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है ।
सावित्री-सत्यवान की कथा - सावित्री अश्वपति की कन्या थी, उसने सत्यवान को पति रूप में स्वीकार किया था । सत्यवान लकड़ियों काटने के लिए जंगल में जाया करता था । सावित्री अपने अंधे सास-ससुर की सेवा करने सत्यवान के पीछे जगंल में चली जाती थी । एक दिन सत्यवान को लकड़ियों काटते समय चक्कर आ गया और वह पेड़ से उतरकर नीचे बैठ गया । उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए । सावित्री ने उन्हें पहचाना और सावित्री ने कहा कि आने मेरे सत्यवान के प्राण न लें । यम ने मना किया मगर वह वापस नहीं लौटी । सावित्री के पतिव्रत धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान के रूप में अंधे सास ससुर की सेवा में आंखें दी और सावित्री को सौ पुत्र होने का आर्शीवाद दिया और सत्यवान को छोड़ दिया । इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को पुनः जीवीत कराया था तभी से यह व्रत ‘‘ वट सावित्री व्रत’’ के नाम से जाना जाता है ।


                                     







गुुलदाऊदी के रंग-बिरंगे फूल

गुुलदाऊदी के रंग-बिरंगे फूल

गुुलदाऊदी ( क्राइसेनथीमम) एक बारहमासी सजावटी फूलों का पौधा है । ग्रीक भाषा में इसे क्राइसैथमम जिसका अर्थ स्वर्णपुष्प है । गुुलदाऊदी संसार के सबसे प्रसिद्ध एवं शरद ऋतु में फूलने वाले पौधों में से है । इसका मूल स्थान चीन है । जो यूरोप, अमरीका, अफ्रीका तथा एशिया महाद्वीपों में मुख्य रूप से उगाया जाता है । गुुलदाऊदी जिसे सेवंती भी कहते हैं गुलाब के बाद सबसे आकर्षक और मनोहारी फूल है क्राइसेनथीमम की विशेषता है कि बगिया में उस समय बहार आती है जब कोई अन्य फूल नहीं होते हैं ।
गुुलदाऊदी मुख्यतः 3 प्रकार की होती है पहली बड़ी, दूसरी छोटी और तीसरी मिनी । बड़ी प्रजाति में करीब 13 आकार के फूल आते हैं जैसे स्पाइडर, टयूबलर, रेलेक्स,  इनकर्व, डेकोरेटिव आदि । छोटी गुुलदाउदी प्रजाति में 6-7 प्रकार आकार के फूल आते हैं जैसे एनीमीनए पाॅम्पन,स्प्रे, कोरियन और नो पिच नो स्टेक आदि और मिनी में भी कई आकार के फूल आते है जैसे काॅटन बाल, बीरबल साहनी, अप्सरा, स्वीट ंिसंगार, जयंती , ननाको , रतन आदि । गुुलदाऊदी की प्रजातियों में 1. बिना डंडे वाली जातियां या माला बनाने हेतु - बग्गी, बसंती, शांति, इंदिरा, राखी, रेड-गोल्ड, बीरबल साहनी, बसंतिका, शरद-माला, मीरा और जया । 2. डंडे वाली जातियां या गुलदस्ते हेतु - अप्सरा, बीरबल साहनी, जयंती, जुबली, कुंदन, पूर्णिमा मेघामी, रायट, आर्कटिका, चार्लिया । गुुलदाऊदी या सेवंती के फूल के औषधीय गुण - गुुलदाऊदी या सेवंती के फूल बहुत सुन्दर होते हैं । इससे घर का वातावरण भी अच्छा होता है । घर मंे इसके दो तीन पत्तों पर देशी लगाकर कच्चे कोयले पर जलाएं तो नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है । हृदय रोग के लिए गर्म पानी में इसकी पत्तियों को डालकर दो मिनट बाद निकाल लें फिर पानी को पीयंे । मासिक धर्म अनियमित हो या दर्द रहता हो तो इसके फूल व पत्तियों का काढ़ा पीयें । पेट दर्द होने पर इसके फूलों का रस शहद या पानी के साथ लें । पथरी होने पर इसके फूलों को सुखाकर उसकी चाय पीयें । गुुलदाऊदी के फूलों का उपयोग चूर्ण अथवा अर्क के रूप मंे किया जाता है । गुुलदाऊदी फूूल में पाईथ्रोम का कीटनाशक गुण होता है छाया मंे सुखाए हुए फूलों से कीटनाशक अंश अधिक प्राप्त होता है । गुुलदाऊदी के फूलों की चाय रात मंे खाना खाने के बाद पीने से हाजमा दुरूस्त होता है । गुुलदाऊदी के रंगबिरंगे फूल शीत ऋतु को खुशनुमा । गुुलदाऊदी के पौधों पर भिन्नभिन्न रंगों के फूल खिलते हैं इसे ‘‘सुनहरा फूल’’ की संज्ञा दी है । गुुलदाऊदी के फूल घर की सजावट में चारचांद लगाते हैं इस की सफेद, पीली, बसंती, गुलाबी, बैगनी आदि रंगों की किस्मंे विकसित की गई हैं । गुुलदाऊदी के फूलों उनकी पंखुड़ी की आकृति व आकार पर निर्भर होता है जैसे गुथे हुए गोल गंेदनुमा फूल को ‘‘ इनकव्र्ड’’, आधा खुला गोल फूल को इंटरमीडिएट, बाहर की ओर बिखरी पंखुड़ी वाले को रिलैक्स्ड, तंतुनुमा सूर्यकिरणों जैसे फूल को स्पून कहते हैं । छोटे फूलों वाली किस्में एनीमोन, कोरियन पोम्पान, वटन आदि भी पाई जाती है ।


 

 










मौसंबी - बहुआयामी औषधीय फल

मौसंबी - बहुआयामी औषधीय फल

मौसंबी नींबू जाति का ही फल है परन्तु नींबू से अनेक गुना लाभदायक है । मौसंबी जिसे मीठा नीबू भी कहते है कि बागवानी दक्षिणी एशिया, दक्षिणी पूवी एशिया में शुरू हुई भारत, पाकिस्तान और बांग्ला देश में आज सबसे आम है । मौसंबी रंग में हरी पर फल की त्वचा परिपक्वता पर हल्के पीले रंग की 5 मि.मी. मोटी एवं छिलका सफेद होता है । मौसंबी का रस तासीर में ठंडा और औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा सभी जगह, सभी मौसमों मे उपलब्ध होता है । मौसंबी के रस में एक मीठी सुगंध होती है । मौसंबी के कई स्वास्थ्य लाभ हैं । मौसंबी सबसे महत्वपूर्ण व्यवसायिक फल दुनिया के सभी महाद्वीपों में उगाई जाने वाले फसलों में से एक है । मौसंबी फल रस प्रसंस्करण उद्योगों द्वारा मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है । मौसंबी को कुशलतापूर्वक दवाओं के रूप में या भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है । मौसंबी की 3 किस्में - नेवल, जुमैका और माल्टा हैं । मौसंबी का रस साबुन, शराब और अन्ये पेयों में डाला जाता है ।  मौसंबी छिलके से तेल निकलता है जिसका सौन्दर्य प्रसाधन एवं औषधी में उपयोग होता है । 
मौसबी के औषधीय गुण -1. मौसंबी एक न्यूट्रा अपनी बहुआयामी औषधीय गुणों के कारण फल के रूप में माना जाता है । 2. मौसंबी का रस एक पोषक भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है मौसंबी का रस पीने से जीवन शक्ति बढ़ जाती है । 3. मौसंबी में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है खटटे और रसदार फलों में मौजूद विटामिन सी न केवल घुटनों के दर्द बल्कि आस्टियो आर्थराइटिस ( घुटने के तंतुओं में क्षरण) को रोकने में मददगार है । 4. मौसंबी का रस तेजी से वजन कम करता है यदि इसे नियमित रूप से गुनगुने पानी और शहद के साथ लिया जाए । 5. मौसंबी के रस में वेनुआइड, लिमोनोइडस पाचक रस और एसिड के स्त्राव उत्तेजक होने से पाचन प्रक्रिया बढ़ाता है । पेट की समस्याओं से राहत दिलाता है यह दस्त और पेचिश के इलाज में मदद करता है इसके टेंजी स्वाद मतली और उल्टी को नियंत्रित करता है । 6. मौसंबी में फाइबर प्रचुर मात्रा में होने के कारण कब्ज को दूर करने में सहायता करता है । 7. मौसंबी में मौजूद, कैरोटीनायॅड तथा हाइड्रोएक्सी नामक अम्ल जीवाणु विरोधी एवं कैंसर, मोतियबिंद और हृदय रोगों के खतरों को कम करते हैं । 8. मौसंबी को पेक्टिन रक्त शर्करा और कोलेस्ट्राल कम करने को गुण रखता है । 9. मौसंबी फल का रस और पत्तियों का रस सर्दी, बुखार, सूजन और पाचन विकार को दूर कर शीतलन प्रभाव देता है ं 10. बालों मे ंरूसी से छुटकारा पाने के लिए बालों को मौसंबी के रस और पानी के मिश्रण से बाल धोने से फायदा पहुंचता है । 11. मौसंबी का सेवन दोपहर में करें । धूप में जाने से कुछ देर पहले या धूप से आने के कुछ देर बाद, मौसंबी खाना या जूस पीना अधिक लाभदायक होता है इससे शरीर में पानी की मात्रा कम नहीं होगी । 12. मौसंबी रस चमड़ी के धब्बे और ब्लेसीसंस दूर कर चेहरे पर चमक लाता है । 13. मौसंबी का रस प्रति रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करता है, रक्त परिसंचरण सुनिश्चित कर हृदय को बल देता है । 14. मसूड़ों की सूजन, गले में दर्द, जुकाम, कटे फटे ओठों के लिए लाभप्रद एवं संक्रमण रोकने में मददगार है क्योंकि इसमें विटामिन सी की प्रचुर मात्रा होती है । 15. मौसंबी रस रक्त प्लेटलेटस के उत्पादन बढ़ाकर प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करता है । 16. मौसंबी निम्नलिखित रोगों में उपयोगी है - सर्दी-जुकाम, अस्थमा,शरीर की शक्ति प्राप्त करने के लिए, रक्त विकार, बुखार, खाँसी, गैस्टिक अल्सर, गर्भवती भोजन, दस्त, रक्त अमीविक डीसेंटरी, गठिया, उच्च रक्तचाप, हार्ट कमजोरी, हृदय रोग, पीलिया, फटे-औंठ और पिंपपस इत्यादि । 17. पैदल चलने, जाॅगिंग या व्यायाम एवं नास्ते के बाद मौसंबी रस लेने से बहुत जल्दी ऊर्जा मिलती है । 18. मौसंबी फल खाने से मधुमेह के इलाज में सहायता मिलती है क्योंकि इसमें ‘‘ नारिनजेनिन’’ नामक एंटी आॅक्सीडेंट होता है जिससे इसका स्वाद हल्का कड़वा हो जाता है यही कड़वापन मधुमेह को रोकने में सहायक है । नारसिजनिन शरीर की संवेदन शीलता को बढ़ाने के लिए इन्सुलिन को नियमित करता है । नारिनजेनिन वजन को नियंत्रित करने में मददगार है । नारिनजेनिन यकृत में वसा को संचित होने से रोकता है । 
मौसंबी के ताजा रस 100 ग्राम - ऊर्जा 25 किलो कैलारी, प्रोटीन 0.5-1.5 प्रतिशत, वसा 0.3 प्रतिशत, कार्बोहाडेट 8 प्रतिशत, कैल्शियम 10 मि.ग्राम, सोडियम 1 मि.ग्रा, पोटेशियम 141 मि.ग्रा., विटामिन ए 20 आई यू, थायमिन 0.3 मि.ग्राम, राबोलेविन 0.01 मि.ग्राम, नायसिन 0.10 मि.ग्रा, विटामिन सी 46 मि.ग्रा.






गुलाब - फूलों का राजा (कोमलता एवं सौन्दर्यता का प्रतीक)

गुलाब - फूलों का राजा (कोमलता एवं सौन्दर्यता का प्रतीक)
गुलाब एक बहुवर्षीय झाड़ीदार, कटीला, पुष्पीय पौधा है । गुलाब का फूल कोमलता और सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध है । गुलाब को फूलों का राजा कहते हैं । रंग, सौन्दर्य और खुशबू मिलकर इसे बेजोड़ बनाते हैं । गुलाब तीनों मापदंडों सुन्दरता, सुगंध और सजावट खरा उतरता है । गुलाब की खेती व्यावसायिक स्तर पर करके काफी लाभ कमाया जा सकता है । गुलाब को विश्व भर में पसंद किया जाता है । गुलाब में जितने रंगों के फूल देखने को मिलते हैं उतने शायद किसी दूसरे फूल में नहीं । गुलाब को भारत में हर जगह उगाया जाता है । बाग बगीचों, खेतों, पार्कों, सरकारी व निजी इमारतों के अहातों में, यहां तक कि घरों के ग्रह वाटिकाओं की क्यारियों और गमलों में । फूलों का राजा गुलाब खुशबू एवं रंगों की विभिन्नताओं से देश धर्म जाति सभी से ऊपर सब का मन मोह लेता है । गुलाब के फूलों से गुलाब जल, गुलाब तेल, गुलकंद और गुलाब इत्र बनाया जाता है । गुलाब बहुउपयोगी है क्योंकि इसके विभिन्न रूप तेल, सूखे पाउडर, उबटन आदि रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।
गुलाब के औषधीय गुण - यह अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्रोंकाइटिस, डायरिया, कफ, फीवर, हाजमे की गड़बड़ी के सेवन बेहत फायदा देता है । गुलाब के फूलों का रस रक्तशोषक होता है । गुलाब का शर्बत मस्तिष्क को बल व शीतलता देता है । गुलाब जल का उपयोग नेत्र विकारों में किया जाता है । गुलाब के अर्क में सफेद चंदन व कपूर पीसकर माथे पर लेप करने से सिरदर्द दूर होता है । गुलाब की पत्तियों के रस कर्णशूल में आराम पहुंचाता है । नींद न आने एवं मानसिक थकावट होने पर सोते समय सिरहाने के पास गुलाब के फूल रख कर सोने से आराम मिलता है । 
गुलकंद -  गुलकंद के कई औषधीय गुणों से भरा होता है । गुलकंद में एंटीआॅक्सीडेंटस होने से यह शरीर की प्रतिराधक क्षमता बढ़ाता है और थकान दूर करता है । सुबह शाम एक एक चममच गुलकंद खाने से मसूढ़ों में सूजन और खून आने की समस्या का समाधान हो जाता है । पेट के रोग जैसे अल्सर और कब्ज में गुलकंद खाने से राहत मिलती है । गुलकंद पाचन क्षमता बढ़ाता है और रक्तशोधन में सहायक कहा गया है । गुलकंद में विटामिन बी, सी और ई की भरपूर मात्रा पाई जाती है । गर्मी के दिनों में गुलकंद स्फूर्ति देने वाला एक शीतल टाॅनिक है जो शरीर को ठंडक पहुंचता है और डीइाइड्रेशन से बचाता है साथ ही तरोताजा रखता है । महिलाओं में गुलकंद को सेवन मासिक धर्म के नियमन में मदद करता है । इसके सेवन से शरीर में आॅक्सीटाॅसिन हारमोन का स्त्राव बढ़ता है ।  इससे पित्त एवं कफ से राहत मिलती है । गुलकंद शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है । 
गुलाब जल - गुलाब की पंखुड़ियों से निकाला गया द्रव है । इसका उपयोग भोजन में लेवर देने, सौन्दर्य प्रसाधनों एवं दवाओं के निर्माण एवं धार्मिक कार्यो में किया जाता है । गुलाब जल त्वचा में  खुशबू और खूबसूरती के लिए लाभदायक होता है । ढीली त्वचा पर गुलाब जल टोनर का काम करता है इसके लगाने से त्वचा में कसाव आता है । गुलाब जल को कच्चे दूध में मिला कर चेहरे, गर्दन और हाथों बाहों पर लगाने से त्वचा साफ होती है चेहरा में चमक आती है । गुलाब जल का नियमित उपयोग सूखी त्वचा को कोमल बनाता है । चेहरे पर काले धब्बे दूर करने के लिए गुलाब जल के साथ खीरे का रस मिला कर लगाने से डार्क सर्कल्स देर होते है । चहरे की झुर्रियों पर फेस पेक में गुलाब जल की कुछ बूंदें त्वचा में बदलाव लाती हैं । गुलाब जल पुरानी त्वचा की कोशिकाओं के रख रखाव और नई त्वचा कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है क्योंकि इसमें पी एच बैलेंस बनाये रखनी की क्षमता होती है । चेहरे के ब्लैक हेड्स एवं मुहांसों को मिटाने के लिए गुलाब जल कारगर सिद्ध हुआ है क्योंकि इसमें एंटीसेप्टिक एवं कीटाणुनाश् गुण पाये जाते हैं । गर्मियांे में अपनी त्वचा पर चंदन पाउडर में गुलाब जल मिला कर लगाएं । त्वचा मुलायम होगी और पिंपल्स से भी निजात मिलेगी । एक चममच गुलाब जल में नींबू की कुछ बूंदें मिला कर  लगाने से त्वचा का कालापन कम हो जाएगा । 
गुलाब इत्र - इत्र की महक में इतनी ताकत है कि वह हमें जिन्दादिल, खुशमिजाज और तरोताजा बना देती है । इसका प्रयोग महकने के अलावा दूसरों को रिझाने और स्फूर्ति पाने के लिए भी होता है । बारात में आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए इत्र छिड़कने की मशीनें लगी होती हे । त्यौहारों के मौसम में इत्र बहुतायत से उपयोग होता है । देवी-देवताओं की पूजा अर्चना में इत्र का प्रयोग होता है । ख्वाज मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गुलाब के इत्र की अच्छी खपत है । मध्यप्रदेश के मुरैना में गुलाब से इत्र बनाने का काम शुरू किया गया है इसके लिए रोजा दमास्क नामक गुलाब का उपयोग किया जाता है । गुलाब इत्र 5 लाख प्रति किलो और गुलाब जल 100 रूपये प्रति लीटर के भाव बिकता है ।

 
 







असील - मुर्गी की लड़ाकू नस्ल

 असील - मुर्गी की लड़ाकू नस्ल
 असील भारत की विशुद्ध नस्ल है जो कि सहनशक्ति और लड़ाकू गुणों के लिए प्रसिद्ध है । असील का अर्थ है ‘‘शुद्ध’’ अथवा ‘‘असल‘‘ । मूल असील मुर्गियां मध्यम आकार की होती हैं । 
शुद्ध असील आक्रमणशील पक्षी है । ऊध्र्वाधर तथा तेजस्वी गठन वाले इस पक्षी की चोंच  छोटी, दृढ़ और मोटी, कलंगी छोटी एवं मटराकार, माथा छोटा आंखों के बीच चैड़ा, चेहरा लम्बा और कुछ कुछ पतला शरीर गोलाकार और छोटा, सीना चैड़ा और पंख गंठे हुए तथा पूंछ छोटी और लटकती हुयी होती है । आंखें तेज और सुगढ़ तथा दाढ़ी नाममात्र को अर्थात बहुत छोटी होती   है ।  इसकी टांगें मजबूत, सीधी परन्तु पतली और एक दूसरे से माकूल दूरी पर होती है । मुर्गियों की चाल बड़ी मुस्तैद होती है जिससे इसकी स्फूर्ति और शक्ति का आभास मिलता है । यह रंग में काला, श्वेत, इश्पाती-नीला, काला-लाल मिश्रित लाल और चित्तीदार होता है ।
असील नस्ल की मुर्गियां कम अंडे देने वाली होती   हैं । असील एक उत्तम खाद्य मुर्गी है जिसमें मांस की मात्रा अधिक होती है । यह स्वादिष्ट और सुरस होता है । मंद वृद्धि एवं न्यून जनन-क्षमता के कारण इसे व्यापारिक पैमाने पर नहीं पाला जा सका पर अब संकरण से इसके गुण जैसे सहनशक्ति एवं मांस की कोटि में सुधार लाया जा सका है । एसील में प्राकृतिक अंडे सेने की क्षमता, बुद्धिमत्ता, एवं सहनशक्ति के लिए प्रसिद्ध है ।
असील की कई नस्लें हैं । इनमें सबसे प्रसिद्ध ‘‘ ईरान ’’ नस्ल है । इस नस्ल का नाम इसके मूल स्थान के नाम पर रखा गया है । भारत में यह नस्ल ईरानी कबीलों से लाई गयी थी । हैदराबाद पीला (लाल), सुन्हरी (सफेद), याखुद (काली या लाल), धम्भर (सलेटी), टीकर (भूरा), जवा (धारीदार), पटेदा (सिंगल काम्ब),  कब्वाल (दाढ़ीदार) , काली, बत्तख जैसे पंखों वाली, और चितकबरी आदि नस्लें पायी जाती हैं । असील नस्ल के मुर्गे का वजन 4-4.5 किलोग्राम तक तथा मुर्गी का वजन 3.2-3.6 किलोग्राम तक होता है । असील की 3 प्रमुख प्रजातियां हैं । 1 मद्रास असील, 2. रजा असील और 3. कुलंग असील ।
1. मद्रास असील - यह प्रजाति तमिलनाडू में पायी जाती है और यहां यह एक लड़ाकू मुर्गी के तौर पर जानी जाती है । इसे थाईलैंड, चीन और दक्षिण एशिया में पाला गया । इसके मुख्य रंग काला, लाल, भूरा, नीले और हरे हैं । इस नस्ल की विशेषता इसकी लम्बी पूंछ जो 60 सें.मी. तक होती है जिसे काटू सेवल कहते हैं ।
2. रजा असील - यह प्रजाति ब्रिटेन द्वारा मानकीकृत जिसका वनज 1.8 से 2.7 किलो होता है जो कि विभिन्न रंगों जैसे काले लाल, प्रकाश लाल, काला, धब्बेदार लाल, जावा देखी जा सकती है । भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में इसे रजा नाम से ही जानते हैं ।
3. कुलेंग असिल-  उत्तरी एवं दक्षिणी भारत और मद्रास में विकसित वजनदार  मुर्गी (5-7 किलो) इसका शरीर गठीला और मजबूत दिखता है ।
एसील भारत की एक प्राचीन नस्ल है जिसे मूल रूप से मुर्गों की लड़ाई के लिए पाला जाता है । इसके कोम्ब और वेटल्स बहुत छोटे होते हैं । एसील प्राकृतिक अण्डे सेने वाली नस्ल है । इसके पंख चिकने और शरीर से चिपके होते हैं । एसील भारत में एक लड़ाकू पक्षी के रूप में विकसित की गई है ।


कुलंग असील 

मद्रास असील 

 रेजा असील








Monday, 26 May 2014

कमल - खूबसूरत, प्रसिद्ध फूल (धार्मिक एवं औषधीय महत्व)

कमल - खूबसूरत, प्रसिद्ध फूल (धार्मिक  एवं औषधीय महत्व)
कमल एक बड़ा और खूबसूरत फूल है जिसे कई नामों से जाना जाता है जैसे पद्म, सरोज, जलज, नीरज और फारसी में कमल को ‘‘ नीलोफर’’ कहते हैं । अग्रेंजी में इंडियन लोटस एवं वैज्ञानिक नाम नीलंबियन न्यूसिफेरा है । कमल पानी में होता है । कमल संसार के सभी भागों में पाया जाता है । कमल चैत बैसाख में फूलने लगता और सावन भादों तक फूलता है । आयुवेंदिक, एलोपैथिक एवं यूनानी औषधीय में कमल के भिन्न भिन्न भागों से दवाईयों बनाई जाती हैं । कमल के  फूलों का विशेष उपयोग पूजा और श्रंगार में होता है । पत्तों का उपयोग पत्तल बनाने के और बीजों का उपयोग मखाने बनाकर औषधीय के रूप में तथा तनों से अत्यन्त स्वादिष्ट सब्जी बनती है । पौराणिक गाथाओं में कमल का विशेष स्थान है पुराणों में ब्रहमा को विष्णु की नाभि से निकले हुए बताया गया है । लक्ष्मी को कमलासना कहा गया है । चतुर्भुज विष्णु को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाला माना जाता है । कमल सूर्योदय होने पर खिलता है और सूर्यास्त होने पर बंद हो जाता है । कमल का फूल देवी लक्ष्मी को बहुत प्रिय है । पूजन सामग्री में इसका होना बहुत शुभ माना जाता है । कमल के फूल, पत्ते, बीज, तना और जड़े सभी उपयोगी हैं । कमल का फूल देवी लक्ष्मी का वास है और इसे भारतीय संस्कृति में पवित्र और शुभ माना जाता है । यह हमारे देश का राष्ट्रीय फूल भी है ।
भारतीय कविता में सब से प्रसिद्ध उपमान है । कमल का फूल, कमल-नयन, कमलानन, करकमल और चरणकमल चारों रूपों में कमल प्रतिष्ठित है । .कमल के फूल फोड़ेे-फुंसी आदि को दूर करता है । शरीर पर विष का कुप्रभाव कम होता है । इसकी पंखुड़ियों के खाने से मोटापा कम होता है, रक्त विकार दूर होते हैं और मन प्रसन्न रहता है इसकी पंखुड़ियों को पीस कर चेहरे पर मलने से सुन्दरता बढ़ती है, इनके फूलों के पराग से मधुमक्खियाँ शहद बनाती है । कमल का फूल का भगवान को इसलिए विशेष प्रिय है क्योंकि कमल पवित्रता का प्रतीक है, इसकी सुन्दरता और सभी का मन मोहने वाली होती है कमल का फूल विकास दर्शाता है । सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए इसका सरल तरीका बताता है । संसाररूपी कीचड़ में रहते हुए भी हमें किस तरह रहना चाहिए यह शिक्षा हम कमल से ले सकते हैं ।  कमल की 8 पंखुड़ियां मनुष्य के अलग-अलग 8 गुणों की प्रतीक है ये गुण हैं दया, शान्ति, पवित्रता, मंगल, निस्पृहता, सरलता, ईष्र्या का अभाव और उदारता ।
मखाना - कमल के बीजों को मखाना कहते हैं यह देवताओं का भोजन भी कहा जाता है । पूजा एवं हवन में भी यह काम आता है । कमल के बीजों को पद्मबीजाभ एवं पानीय फल कहा गया है । मखानों को प्रसव पूर्व एवं पश्चात आई कमजोरी दूर करने के लिए दूध में पकाकर खिलाते हैं । मखानों को नमकीन बनाने के लिए इसे घी या तेल में बघार के खाया जाता है । इसे खीर में मिलाते है, इसे पंजीरी और लडडू में मिलाया जाता है । मखानांे में एन्अीआॅक्सीडेंट गुण पाये गये हैं जो श्वसनतंत्र, मूत्राशय एवं जननतं. बीमारियों में यह लाभप्रद होता है । मखानों का नियमित सेवन करने से ब्लड प्रेशर, कमर और घुटने के दर्द को नियंत्रित रहता है । दस्त लगने पर मखाने का चूरा 1 चम्मच दही के साथ खिलाएं । कमल के बीज ऊर्जा, जीवन शक्ति और पाचन के साथ के साथ मदद करने के लिए बढ़ाने के लिए एक पूरक के रूप में लिया जाता है । कमल के बीज में 20 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है । कमल की जड़ सांस की शिकायत को दूर करने में उपयोग होता है । कमल की जड़ के रस से अस्थमा, तपेदिक और खाँसी की ऐठन को दूर किया जा सकता है और यह फेफड़ों के साथ जुड़े रोगों के लिए एक इलाज है । कमल की पंखुड़ियों व्यंजन खाना पकाने में और इत्र की तैयारी में उपयोग होता है । कमल की पंखुड़ी की चाय दिल को मजबूत बनाने और रक्त में शर्करा के स्तर को करने में सहायक है । कमल की जड़ों की चाय सूजन को कम करने और घाव की सफाई करने में सक्षम है । कमल के पत्ते से बनी चाय जुकाम, सिर दर्द, खांसी, नाक सीर और दस्त कम कर देते हैं ।
मखाना तालाब, झील, दलदली क्षेत्र में शांत पानी में उगाये जाने वाला एक जलीय उत्पाद है । मखाने के बीज को भूनकर इसका उपयोग मिठाई, नमकीन, खीर आदि बनाने में होता है । मखाने में 9.7 प्रतिशत प्रोटीन, 76 कार्बोहाईडेªट, 12.8 प्रतिशत नमी, 0.1 प्रतिशत वसा, 0.5 प्रतिशत खनिज लवण, 0.9 प्रतिशत फाॅस्फोरस एंव 1.4 मिलीग्राम लौह पाया जाता है । मखाना बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल, सीतामढ़ी, पूर्णिया,कटिहार जिलों में सार्वधिक उत्पादन होता है । मखाना का कुल उत्पादन का 88 प्रतिशत बिहार में होता है । कमल के बीचों में फेवनोयाड एंटीआॅक्सीडेंट जो शरीर के मुक्त कणों के प्रतिकूल प्रभाव को दूर करते हैं । इसके शक्तिशाली एंटीआॅक्सीडंेट एंटी एजिंग प्रभाव पाया गया है । इसमें सोडियम कम और पोटेशियम ज्यादा होती है । कैलोरी में कम और वसा और फाइबर में अधिक होने के कारण रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करता है । कमल के बीज गठिया और आमवाती दर्द के उपचार में किया जाता है । कमल के बीज कामोद्दीपक होने के कारण वीर्य के गुणवत्ता और मात्रा बढ़ जाती है, शीघ्रपतन से बचाता है , कामेच्छा बढ़ जाती है और महिला बांझपन में मदद करता है ।
मखाना वस्तुतः फाक्सनट के बीजों की लाई है । कमल अधिकतर लाल, सफेद और नीले रंग के होते हैं पर पीले और स्वर्ण कमल भी पाये जाते  है ।









खरमोर - विलुप्त पक्षी

खरमोर - विलुप्त पक्षी
खरमोर एक बड़े आकार का लम्बी टाँगों वाला भारतीय पक्षी है इसे ‘‘चीनीमोर ’’ या ‘‘ केरमोर ’’ भी कहते हैं । यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी महाराष्ट , नासिक, अहमदाबाद से लेकर पश्चिमी घाट तक के भारतीय क्षेत्र में पाया जाता है किन्तु वर्षा ऋतु में यह मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात तक फेल जाता है । भारत में रतलाम, सरदारपुर सहित कई स्.थानों पर खरमोर के अभायारण्य हैं । नर और मादा बहुत कुछ एक से ही होते हैं । इसके सिर, गर्दन और नीचे का भाग काला और ऊपरी हिस्सा हलका सफेद और तीन सदश काले चित्तियों से भरा रहता है । काने के पीछे कुछ पंख बढ़े हुए रहते हैं । प्रणय तु में नर बहुत चमकीला काले रंग का हो जाता है और सिर पर एक सुंदर कलंगी निकल आती है । मादा नर से कुछ बड़ी होती है । नर का जाड़ों में और मादा का पूरे वर्ष ऊपरी और बगल का भाग काले चिन्हों युक्त हलका बादामी रहता है । इस पक्षी को ऊबड़ खाबड़ और झाड़ियों से भरे मैदान बहुत पंसद हैं , जाड़ों में इसे खेतों में भी देखा जा सकता है । इसका मुख्य भोजन घासपात, जंगली फल, पौधों की जड़े, नए कल्ले एवं कीडे मकोड़े हैं ।
खरमोर को मध्यप्रदेश में खर तीतर के नाम से पुकारते हैं ।  मध्यप्रदेश में 94 हजार 689 वर्ग किलोमीटर में वन क्षेत्र है । प्रदेश में 10 राष्टीय उदयान और 25 वन्य प्राणी अम्यारण्य है जो विविधता से भरपूर है । मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में सैलाना में खरमोर बड़ी संख्या में प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में चार माह के लिए आते हैं । इनकी राष्टीय स्तर पर घटती हुई संख्या के कारण इस पक्षी का संकटापन्न की श्रेणी में रखा है । इनका रहवास घास का वह क्षेत्र है जो सामान्यतर खेतों के आसपास स्थित है । मालवा क्षेत्र में ग्रामीण लोग इसे भटकुकड़ी नाम से भी पहचानते हैं । सैलाना क्षेत्र के अतिरिक्त धार जिले के सरदारपुर क्षेत्र में भी खरमोर पक्षी प्रतिवर्ष आते हैं । खरमोर पक्षी का आकार साधारण मुर्गी के बराबर होता है । खरगोन पक्षियों के आगमन से सामान्यतः 10 से 15 दिवस पश्चात नर पक्षी घास के मैदानों में अपनी टेरीटेरी निर्धारण का प्रयास करने लगते हैं ।  इसके शर्मीले होने के कारण इसे दूर से ही देख जा सकता है । सामान्यतः नर पक्षी तीन से चार फुट की उंचाई तक कूदते हैं । कूदते समय नर पक्षी अपने पंखों  का सफेद भाग विशेष रूप से प्रदर्शित करते हैं और एक तेज विशेष प्रकार की टर्र टर्र आवाज करते हैं  जो कि 500 मीटर तक सुनी जा सकती है । रतलाम जिले के साथ ही प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से भी पक्षी प्रेमी प्रति वर्ष बड़ी संख्या में खरमोर देखने के लिए सैलाना पहुंचते हैं । उचित अवधि - अगस्त और सितम्बर माह (वर्षा की स्थिति पर निर्भर ), उचित समय - प्रातः और सांयकाल, उचित स्ािल - शिकारवाड़ी ( यह स्ािल सैलाना से तीन किलोमीटर और रतलाम से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ), उचित सलाह - घास बीड़ों में घूमने के लिए लांग बूट साथ ले लें । खरमोर देशी मुर्गे के आकार का पक्षी है । यह सोहन चिड़िया परिवार का सदस्य है । इनमें प्रजनन के दौरान जब नर और मादा जोड़ा बांधते हैं ते कुछ में मार-धाड़ और खून खच्चर तक की नौबत आ जाती है । कुछ में मादा को आकर्षित करने के लिए नर बड़ी शालीनता से नाच-गाना करते हैं । खरमोर के प्रणय-निवेदन का तरीका बड़ा ही अनूठा है । खरमोर स्ािानीय रूप से स्ािानांतरण करते हैं और बरसात के दिनों में ऐसे स्थान पर पहुंच जाते हैं जहां ऊंची ऊंची घास के मैदान हों । दरअसल घास के मैदान खरमोर के प्रजनन स्ािल हैं । कभी-कभी ये घास के मैदान से लगे कपास या सोयाबीन आदि फसलों वाले खेतों में भी पहुंच जाते हैं । नर खरमोर प्रजनन काल में आकर्षक रूप धारण कर लेता है । उस समय इसकी गर्दन और छाती काले रंग की तथा बगल वाले पंख सफेद होते हैं माथे पर एक कलगी होती है मादा खरमोर बारहों मास एक सरीखी रहती है । यह मटमैले रंग की तथा चितकबरी होती है । प्रजनन काल नर खरमोर काफी सक्रिय हो उठता है जबकि मादा शर्मिली तथा चुप रहती है । बरसात के दिनों में घास के मैदानों में घास काफी ऊंची उठ जाती है ऐसे में नर खरमोर मादा का आकर्षित करने तथा अपनी उपस्थिति जताने के लिए ऊपर उछलता है । ऊपर उछलते वक्त नर खरमोर अपने पंखों को फड़फड़ाता है, अपनी दुम को फुला लेता है और जोर से आवाज निकालता है और फिर पैराशूट की भांति गिरते हुए वापस जमीन पर लौट आता है । नर खरमोर की आवाज इतनी तेज होती है कि लगभग आधे किलोमीटर के क्षेत्र में गूंजती है । अक्सर नर खरमोर सुबह या शाम का उछलता है या फिर दिन में घने बादल छाए हों तब भी उछलते देखा गया है । नर खरमोर इस उछाल के दौरान क्षेत्र रक्षण करता है कई बार दो या अधिक नर खरमोर में होड़ शुरू हो जाती है । जब एक नर खरमोर उछलता है तो दूसरा तभी ऊपर उछलेगा जब पहला खरमोर जमीन पर आ जाएगा । दिन भर में एक नर खरमोर 400 बार तक उछलते देखा गया है । प्रजनन के बाद मादा खरमोर जमीन पर किसी छिछले गडढ़े में 3-4 अंडे देती है और फिर उन्हें सेती है ।  अंडों से जो बच्चे निकलते हैं उनकी देखभाल भी मादा ही करती है नर खरमोर की अपनी संतान की परवरिश में कोई भूमिका नहीं होती है । मध्यप्रदेश के धार जिले में सरदारपुर तथा रतलाम जिले में सैलाना  में खरमोर अम्यारण बनाए गए हैं । जहां बरसात के दिनों में खरमोर स्.थानांतरित होकर आते हैं और प्रजनन करके फिर न जाने कहां चले जाते हैं । खरमोर (लेसर फलोरिकन) बेहद दुर्लभ प्रजाति जो इंसानों को देखकर फौरन छिप जाने वाले पंछी हैं लिहाजा इनकी गतिविधियों को निहारने का अनुभव अपने आप में दुर्लभ है । नर खरमोर मादा को रिक्षाने के लिए सैकड़ों बार उड़ उड़ कर कलाबाजियां दिखाते हुए टर्र टर्र के स्वर में बाकायदा प्रेमगीत भी गाता है । सुराहीदार गर्दन वाले नर के सिर पर सुंदर कलंगी होती । खरमोर के प्रजनन के साथ एक दुखद पहलू यह कि इंसानों ने इसे गेम बर्ड बना डाला है शिकारी करने के लिए बरसात के दिनों में घात लगाकर बैठे रहते हैं जब नर खरमोर मादा को रिक्षाने के लिए उछलता है तो शिकारी उसे निशाना बना देते है आज इसलिए इनकी संख्या कम हो रही है । इन्हीं सब कारणों से खरमोर अब इतने कम हो गए हैं कि इन्हें विलुप्तशील पक्षियों की श्रेणी में गिना जाने लगा है ।