Saturday, 24 May 2014

केवड़ा अत्यधिक खुशबूदार फूल

केवड़ा अत्यधिक खुशबूदार  फूल

केवड़ा सुगंधित फूलों वाले वृक्षों की एक प्रजाति है । जो घने जंगलों में उगती है । पतले, लंबे, घने और काँटेदार पत्तों वाले पेड़ की दो प्रजातियां है 1. सफेद और पीली । सफेद जाति को केवड़ा और पीली को केतकी कहते हैं । केतकी बहुत सुगंन्धित होती है और उसके पत्ते कोमल होते हैं । इसमें जनवरी और फरवरी में फूल लगते हैं । इसके वृक्ष गंगा नदी के सुन्दरवन डेल्टा में बहुतायत से पाए जाते हैं । केवड़े के झाड़ों में सांप प्रायः आश्रय लेते हैं । मानसी देवी सर्पों की रक्षिका देवी का जन्म स्थान केवड़े के झाड़ हैं । केवड़ा का उपयोग इत्र, पान मसाला, गुलदस्ते, लोशन ,तम्बाखू, केश तेल, अगरबत्ती , साबुन में सुगंध के रूप में किया जाता है । केवड़ा जल का उपोग मिठाई, सायरप और शीतल पेय पदार्थों में सुगंध लाने के लिए करते है । इसकी पत्तियों का उपयोग झोपड़ियों को ढ़कने, चटाई तैयार करने, टोप, टोकनियों और कागज निर्माण करने के लिए किया जाता है । इससे प्राप्त लंबी जड़ों के रेशो का उपयोग रस्सी बनाने में और टोकनियां बनाने में किया जाता है । केवड़ा तेल का उपयोग औषधि के रूप सिरदर्द और गठियावत में किया जाता है । पत्तियों का उपयोग कुष्टरोग, चेचक, खुजली, ल्यूकोडर के उपचार में किया जाता है । केवड़ा के फूल ही सबसे उपयोगी होता है । केवड़ा के नर पुष्प अत्यधिक खुशबूदार होते है तथा इसका उपयोग केवड़ा तेल और केवड़ा इत्र बनाने में किया जाता है । भारत में यह समुद्र के किनारे वाले क्षेत्र में पाया जाता है । यह ज्यादातर नदी किनारे, नहर खेत और तालाबों के आसपास ऊगता है ।
केवड़ा को वनस्पति विज्ञान में पेन्डोनस आॅडोर्फि कहते हैं । केवड़ा होेने पर अठारह फुट की ऊंचाई तक बढ़ते हैं और परिपक्व पौधे में 30 से 40 फूल लगते हैं जिनका रंग सफेद होता है जिसे ‘‘ सफेद कमल ’’ के नाम से जाना जाता है । केवड़ा भारत में दक्षिणी भारत, बर्मा, अंडमान व एशिया, आस्टेलिया के जंगली इलाके में उगता है । उड़ीसा में केवड़े को ‘‘फूलों का राजा’’ माना जाता है और ‘‘ किया’’ नाम से जाना जाता है । केवड़ा मानसून में उगाया जाता है । पौराणिक कथाओं में केवड़े को एक शापित पौधा माना गया है । इसे ईश्वर की आराधना में उपयोग में नही लिया जाता है । शिवजी ने ब्रहमा व केतकी को शाप दिया कि उनकी कभी पूजा नहीं होगी यही कारण है कि पूरे विश्व में ब्रहमाजी का सिर्फ पुष्कर में ही मंदिर है और केवड़े के फूल को आज भी पूजा में उपयोग नहीं किया जाता । केवड़े के फूल के कई उपयोग हैं, जैसे केवड़े का तेल, अर्क, व्यंजनों को सुगंधित करने के लिए । केवड़े के तेल का प्रयोग सिरदर्द व गठिया के उपचार में किया जाता है । केवड़े का अर्क सुगंधित व्यंजन जैसे  रसगुल्ला, गुलाब जामुन, रबड़ी, रस-मलाई, तथा मुगलाई व्यंजनों में किया जाता है । सूखे केवड़े के पत्तियों का उपयोग तम्बाकू में भी किया जाता है । सुगंध में केवड़े के फूल के सूख जाने के बाद भी खुशबू निरंतर बनी रहती है । केवड़ा से केवड़ा तेल, केवड़ा जल और केवड़ा इत्र  मिलता है ।






  

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